बजट उम्मीद: थिंक टैंक ने दिया सुझाव, टैक्स में नरमी और सरलीकरण से ज्यादा कमाई कर सकती है सरकार

नई दिल्ली। देश अगले केंद्रीय बजट की तैयारी कर रहा है। इन तैयारियों के बीच थिंक चेंज फोरम (टीसीएफ) (Think Change Forum (TCF))की एक नई रिपोर्ट में देश की टैक्स फिलॉसफी में आधारभूत बदलाव की जरूरत जताई है। इसमें कहा गया है कि जीएसटी 2.0 ने स्पष्ट रूप से दिखाया है कि दरों में बढ़ोतरी के बजाय टैक्स में नरमी और सरलीकरण से ज्यादा राजस्व प्राप्त किया जा सकता है।

रिपोर्ट में नीति निर्माताओं के लिए छह बिंदुओं की एडवाइजरी दी गई है और जीएसटी सुधार के सिद्धांतों को प्रत्यक्ष कर (डायरेक्ट टैक्स), प्रवर्तन (एन्फोर्समेंट) और निवेश नीति (इन्वेस्टमेंट पॉलिसी) के मामले में भी लागू करने की अपील की है।

इस एडवाइजरी के मूल में नीति में निश्चितता और अनुपालन-आधारित विकास पर जोर दिया गया है। इसमें अधिकतम टैक्स दरों को स्थिर (फ्रीज) करने, दरों में बढ़ोतरी के बजाय टेक्नोलॉजी के जरिये डायरेक्ट टैक्स बेस को बढ़ाने, कंपनसेशन सेस खत्म होने के बाद एमआरपी-आधारित टैक्सेशन से बचने, जीएसटी इनपुट क्रेडिट चेन को पूरा करने, मुनाफे के प्रोडक्टिव रीइन्वेस्टमेंट को बढ़ावा देने और तस्करी एवं अवैध व्यापार सहित पैरेलल इकोनॉमी के खिलाफ कार्रवाई तेज करने जैसे कदम शामिल हैं।

‘शेपिंग इंडियाज न्यू टैक्सेशन आइडियोलॉजी: सिंप्लीफिकेशन, मॉडरेशन एंड ग्रोथ’ (भारत की नई कराधान विचारधारा को आकार देना: सरलीकरण, नरमी और विकास) शीर्षक वाली यह रिपोर्ट टैक्स प्रैक्टिशनर्स एवं अर्थशास्त्रियों के साथ विशेषज्ञ सलाह-मशविरे के बाद जारी की गई। इसमें तर्क दिया गया है कि भारत एक ऐसे वित्तीय मोड़ पर है, जहां जीएसटी सुधारों से मिले सबक के आधार पर अब व्यापक टैक्सेशन फ्रेमवर्क को आकार देने की जरूरत है।

रिपोर्ट में हाल के समय में जीएसटी के प्रदर्शन को प्रमाण के तौर पर पेश किया गया है। जीएसटी 2.0 के तहत दरों को सरल और कम करने के बावजूद अक्टूबर, 2025 में कुल कलेक्शन 1.95 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया, जो पिछले साल के मुकाबले 4.6 प्रतिशत ज्यादा है। यह इस बात को सही सिद्ध करता है कि भारत जैसी ज्यादा अनौपचारिक अर्थव्यवस्था में दरों में बदलाव के मुकाबले नियमों का अनुपालन आसान बनाना ज्यादा मायने रखता है। व्यवस्था आसान होने से ज्यादा लोग टैक्स के दायरे में आते हैं और राजस्व बढ़ता है।

परिचर्चा में शामिल विशेषज्ञों ने भी इसी बात का समर्थन किया। जाने-माने चार्टर्ड अकाउंटेंट योगेंद्र कपूर ने कहा, ‘ज्यादा टैक्स, चाहे डायरेक्ट हों या इनडायरेक्ट, हमेशा टैक्स चोरी और भ्रष्टाचार को बढ़ावा देते हैं। कम टैक्स से टैक्स बेस बढ़ता है और अनुपालन बेहतर होता है। जीएसटी कलेक्शन बढ़ रहा है क्योंकि इकोनॉमी फॉर्मल हो रही है। लेकिन, हमें एक नई 40 प्रतिशत की अधिकतम दर बनाने से बचना चाहिए। इस ऊंची दर के कारण अनुपालन कमजोर होगा। आदर्श रूप से जीएसटी को केवल 5 प्रतिशत और 18 प्रतिशत तक ही सीमित रखना चाहिए।’

इस रिपोर्ट में भारत की टैक्स बहस को यहां की प्राचीन बौद्धिक परंपराओं से जोड़ा गया है और अधिकतम दरों को स्थिर करने की सलाह दी गई है। अर्थशास्त्री और पब्लिक फाइनेंस एक्सपर्ट डॉ. सुरजीत दास ने कहा, ‘अर्थशास्त्र के आधार पर देखा जाए तो कौटिल्य ने उपज का छठा हिस्सा यानी लगभग 16 प्रतिशत टैक्स के तौर पर लेने का प्रस्ताव दिया था। आज हमारा कुल टैक्स-टू-जीडीपी अनुपात उसी के आसपास है।’ वैसे तो वैश्विक मानकों के हिसाब से 17 प्रतिशत का भारत का टैक्स-टु-जीडीपी अनुपात ज्यादा नहीं है, लेकिन रिपोर्ट में चिंता जताई गई है कि डायरेक्ट टैक्स बेस का छोटा होना और इनडायरेक्ट टैक्स पर ज्यादा निर्भरता, स्वाभाविक रूप से प्रतिगामी है।