नई दिल्ली। राजद के राज्यसभा सांसद संजय यादव ने ग्रामीण विकास मंत्रालय के कार्यों पर चर्चा में भाग लेते हुए संसद में कहा कि भारत की आत्मा गाँवों में बसती है, लेकिन आज वही आत्मा संघर्ष, उपेक्षा और ना-उम्मीदी के दर्द और बोझ तले कराह रही है। इस सरकार ने गाँवों, ग्रामीणों, किसानों और गरीबों को फ़ाइलों और घोषणाओं में बंद कर दिया है?
राजद सांसद ने कहा कि आज लाखों ग्रामीण युवा रोज़गार के लिए शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। गाँव अब उत्पादन का केंद्र नहीं, बल्कि पलायन का केंद्र बन गए हैं। लगभग 29% आबादी प्रवासी (migrant) है और उनमें से 89% ग्रामीण क्षेत्रों से आते हैं। इस सरकार की ग़लत नीतियों और निर्णयों के कारण किसानों और गांवों के बेटे अब शहरों में दिहाड़ी मजदूर बन रहे हैं।संजय यादव ने कहा कि आप 81 करोड़ भारतवासियों को सिर्फ जीवित रहने की न्यूनतम आवश्यकता पूरी करने के लिए 5 किलो अनाज दे रहे है, और ऊपर से गरीबी खत्म करने का दावा करते है। यह विरोधाभास सरकार के ग्रामीण विकास मॉडल की सबसे बड़ी विफलता है।
प्रधानमंत्री ग्रामीण आवास योजना की आप बात कर रहे है लेकिन यह नहीं बताते कि बिहार की 14 फीसदी आबादी का कच्चे घरों में रहती है। बिहार में लगभग 1 करोड़ 4 लाख 90 हज़ार परिवारों के पास पक्का घर नहीं है. वित्तीय वर्ष 2024-25 और 2025-26 के लिए बिहार को कुल 12 लाख 21 हजार 247 आवास बनाने का लक्ष्य मिला था। अब तक मात्र दो लाख 85 हजार आवास ही तैयार हो पाए हैं। 9 लाख आवासों का को अता-पता नहीं है। बिहार के ग्रामीण विकास मंत्री का आधिकारिक बयान है कि केंद्र सरकार से प्रधानमंत्री आवास योजना में मदद नहीं मिली है।ग्रामीण रोजगार योजना महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MGNREGA) में काम की कमी और भुगतान में देरी बड़ी समस्या है। मनरेगा से गाँधी का हटाया जाना कोई अचानक घटना नहीं है। आज से 11 साल पहले जब खादी के कैलेंडर से गाँधी को हटा कर प्रधानमंत्री ने अपनी तस्वीर छपाई थी।
बिहार आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट के अनुसार बिहार में अत्यधिक ग्रामीण बेरोजगारी दर है। नीति आयोग के अनुसार बिहार में सबसे अधिक गरीबी है। बिहार में सबसे अधिक पलायन दर है। देश में सबसे कम किसानों की आय बिहार में हैं। देश में सबसे कम ग्रामीणों की आय बिहार में हैं। बिजली की सबसे कम खपत बिहार में हैंमहोदय, गाँव विकास को तरसते हैं, ग्रामीण तड़पते है तब जाकर शहर चमकते हैं।इन्होंने विकास मापने का पैमाना बदल दिया।बेरोज़गारी आँकड़ों से गायब कर दी गई।गरीबी “लाभार्थी” नामक शब्द में छुपा दी गई।लेकिन लोगों की माली हालात, उनकी चीखें, दर्द, पीड़ा और जमीनी सच्चाई को थोड़े दबा सकते है, छुपा सकते है।इनके ग्रामीण विकास विभाग में गाँवों, ग्रामीणों और गरीबों में उतना ही “विकास” होता है जितना गुलाब जामुन में गुलाब और जामुन होता है। यही इनके ग्रामीण विकास की सच्चाई है।






