
भारत विदेशी मुद्रा भंडार के मामले में आज दुनिया के शीर्ष पांच देशों में शामिल है। लेकिन 30 साल पहले भारत के पास विदेशी कर्ज का ब्याज चुकाने के लिए भी पैसे नहीं थे और डिफॉल्टर होने के करीब पहुंच गया था।
सिर्फ इतने दिन का चल सकता था खर्च
वर्ष 1991 में भारत के पास महज एक हफ्ते का विदेशी मुद्रा भंडार बचा हुआ था। हालात इतने खराब हो चुके थे कि भारत के पास विदेशी कर्ज के ब्याज अदायगी के लिए भी राशि नहीं बची थी। आपको बता दें कि विदेशी मुद्रा भंडार किसी भी देश की आयात की जरूरत के लिए बेहद अनिवार्य है।
सोना गिरवी रखने की नौबत
30 साल पहले भारत के पास विदेशी भंडार की हालत इतनी खराब थी कि उसे सोना भी गिरवी रखने की नौबत आ गई थी। तब भारत के प्रधानमंत्री नरसिंह राव और वित्त मंत्री मनमोहन सिंह थे। उस समय प्रधानमंत्री नरसिंह राव ने मनमोहन सिंह से इसका हल निकालने के लिए सुझाव मांगा। वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने प्रधानमंत्री को ऐसा सुझाव दिया जिसे किसी अल्पमत सरकार के लिए करना बेहद कठिन था।
..तो राजनीतिक भूचाल आ जाएगा
मनमोहन सिंह ने तब प्रधानमंत्री नरसिंह राव को कहा कि यदि भारतीय मुद्रा यानी रुपये का 20 फीसदी अवमूल्यन कर दिया जाए तो इस समस्या का हल निकल सकता है और तेजी से विदेशी मुद्रा देश में आनी शुरू हो जाएगी। लेकिन साथ ही मनमोहन सिंह ने यह भी कहा कि यदि कैबिनेट की बैठक में इसकी चर्चा हुई तो इसे लागू करना कठिन होगा क्योंकि तब राजनीतिक भूचाल आ जाएगा।

सिर्फ 20 मिनट में हो गया फैसला
वित्त मंत्री मनमोहन सिंह के सुझाव को सुनकर प्रधानमंत्री नरसिंह राव चिंता में पड़ गए। हालांकि, इसके बाद भी उन्होंने कहा कि 20 मिनट बाद मैं इस पर कुछ बताउंगा। उस समय विपक्ष के नेता अटल बिहारी वाजपेयी थे। नरसिंह राव ने वाजपेयी जी को बुलाया और इस बारे में सुझाव मांगा। तब वाजपेयी ने कहा कि इसे संसद में बहस कराकर पास नहीं करा सकते है और न ही कैबिनेट से सलाह लेने का जोखिम ले सकते हैं। वाजपेयी जी ने कहा कि बात देश की है तो पहले फैसला किजिए विपक्ष आपके साथ खड़ा रहेगा। उसके बाद नरसिंह राव ने मनमोहन सिंह को बुलाकर इसे लागू करने को कहा।






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